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महिला सशक्तीकरण क्या है? व अधिकार, भूमिका-Women Empowerment Hindi | Gurugrah




महिला सशक्तीकरण | Women Empowerment Hindi | Gurugrah

महिला सशक्तीकरण

महिला सशक्तीकरण से जुड़े सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और कानूनी मुद्दों पर संवेदनशीलता और सरोकार व्यक्त किया जाता है। सशक्तीकरण की प्रक्रिया में समाज को पारंपरिक पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण के प्रति जागरूक किया जाता है, जिसने महिलाओं की स्थिति को सदैव कमतर माना है। वैश्विक स्तर पर नारीवादी आंदोलनों और यूएनडीपी आदि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने महिलाओं के सामाजिक समता, स्वतंत्रता और न्याय के राजनीतिक अधिकारों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। महिला सशक्तीकरण, भौतिक या आध्यात्मिक, शारिरिक या मानसिक, सभी स्तर पर महिलाओं में आत्मविश्वास पैदा कर उन्हें सशक्त बनाने की प्रक्रिया है।


महिला सशक्तीकरण क्या है?

महिला सशक्तीकरण को बेहद आसान शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है कि इससे महिलाएं शक्तिशाली बनती है जिससे वह अपने जीवन से जुड़े सभी फैसले स्वयं ले सकती है और परिवार और समाज में अच्छे से रह सकती है। समाज में उनके वास्तविक अधिकार को प्राप्त करने के लिए उन्हें सक्षम बनाना महिला सशक्तीकरण है। इसमें ऐसी ताकत है कि वह समाज और देश में बहुत कुछ बदल सके।


भारत में महिला सशक्तीकरण

भारत की आधी आबादी महिलाओं की है और विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार अगर महिला श्रम में योगदान दे तो भारत की विकास दर दहाई की संख्या में होगी। फिर भी यह दुर्भाग्य की बात है कि सिर्फ कुछ लोग महिला रोजगार के बारे में बात करते हैं जबकि अधिकतर लोगों को युवाओं के बेरोजगार होने की ज्यादा चिंता है।


हाल ही में प्रधानमंत्री की ‘आर्थिक सलाहकार परिषद’ की पहली बैठक में 10 ऐसे प्रमुख क्षेत्रों की चिह्नित किया गया जहां ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। दुर्भाग्य की बात यह है कि महिलाओं का श्रम जनसंख्या में योगदान तेजी से कम हुआ है। यह लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। लेकिन फिर महिला रोजगार को अलग श्रेणी में नहीं रखा गया है नेशनल सैंपल सर्वे (68 वां राउंड) के अनुसार 2011-12 में महिला सहभागिता दर 25.51% थी जो कि ग्रामीण क्षेत्र में 24.8% और शहरी क्षेत्र में मात्र 14.7% थी। जब रोजगार की कमी है तो आप महिलाओं के लिए पुरुषों के समान कार्य अवसरों की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? एक पुरुष ज्यादा समय तक काम कर सकता है उसे मातृत्व अवकाश की जरूरत नहीं होती है और कहीं भी यात्रा करना उसके लिए आसान होता है निर्माण कार्यों में महिलाओं के लिए पालना घर या शिशुओं के लिए पालन की सुविधा मुहैया कराना जरूरी होता है।


ऐसे कई कारण हैं जिनसे भारत की महिला श्रमिक सहभागिता दर्ज में पिछले कुछ वर्षों में गिरावट आई है और यह दर दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के बाद सबसे कम है। नेपाल , भूटान और बांग्लादेश में जनसंख्या के अनुपात के अनुसार महिला रोजगार ज्यादा है। इन क्षेत्रों के पुरुष काम करने के लिए भारत आते हैं और उनके पीछे महिलाएं अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए खेतों में काम करती है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) मैं महिलाएं मात्र 17% का योगदान दे रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार क्रिसटीन लगार्डे का कहना है कि ज्यादा से ज्यादा महिलाएं अगर श्रम में भागीदारी करे तो भारत की GDP 27% तक बढ़ सकती है।


महिला सशक्तिकरण की शुरुआत

महिला सशक्तिकरण की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 08 मार्च,1975 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से मानी जाती हैं। फिर महिला सशक्तिकरण की पहल 1985 में महिला अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन नैरोबी में की गई। ध्यान रहे की भारत सरकार ने समाज में लिंग आधारित भिन्नताओं को दूर करने के लिए एक महान नीति महिला कल्याण नीति 1953 में अपनाई थी।


महिला सशक्तिकरण की भूमिका

महिला सशक्तिकरण की भूमिका सबसे पहले आपको बता दे की ‘सशक्तिकरण’ से तात्पर्य किसी व्यक्ति की उस क्षमता से है, जिससे उस व्यक्ति में वह योग्यता आ जाती है, जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े सभी महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं ले सके, और खुद के बारे में उचित और अनुचित न्याय कर सके।


महिला सशक्तीकरण के लिए दिए गए अधिकार

· समान वेतन का अधिकार – समान पारिश्रमिक अधिनियम के अनुसार अगर बात वेतन या मजदूरी की हो तो लिंग के आधार पर किसी के साथ भी भेदभाव नहीं किया जा सकता |


· कार्य-स्थल में उत्पीड़न के खिलाफ कानून – यौन उत्पीड़न अधिनियम के तहत आपको वर्किंग प्लेस पर हुए यौन उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने का पूरा हक है। केंद्र सरकार ने भी महिला कर्मचारियों के लिए नए नियम लागू किए हैं, जिसके तहत वर्किंग प्लेस पर यौन शोषण के शिकायत दर्ज होने पर महिलाओं को जांच लंबित रहने तक 90 दिन का पैड लीव दी जाएगी।


· कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अधिकार – भारत के हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह एक महिला को उसके मूल अधिकार ‘जीने के अधिकार’ का अनुभव करने दें। गर्भाधान और प्रसव से पूर्व पहचान करने की तकनीक लिंग चयन पर रोक अधिनियम (PCPND) कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अधिकार देता है।


· संपत्ति पर अधिकार – हिंदू उत्तराधिकारी अधिनियम के तहत नए नियमों के आधार पर पुश्तैनी संपत्ति पर महिला और पुरुष दोनों का बराबर हक है।


· गरिमा और शालीनता के लिए अधिकार – किसी मामले में अगर आरोपी एक महिला है तो उस पर की जाने वाली कोई भी चिकित्सा जांच प्रक्रिया किसी महिला द्वारा या किसी दूसरी महिला की उपस्थिति में ही की जानी चाहिए।


· महिला सशक्तीकरण – महिलाओं का पारिवारिक बंधनों से मुक्त होकर अपने और अपने देश के बारे में सोचने की क्षमता का विकास होना ही महिला सशक्तीकरण कहलाता है।


महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य

महिला सशक्तिकरण की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आठ मार्च,1975 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से मानी जाती हैं। फिर महिला सशक्तिकरण की पहल 1985 में महिला अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन नैरोबी में की गई। भारत सरकार ने समाज में लिंग आधारित भिन्नताओं को दूर करने के लिए एक महान नीति महिला कल्याण नीति 1953 में अपनाई।


महिला सशक्तिकरण का राष्ट्रीय उद्देश्य महिलाओं की प्रगति और उनमें आत्मविश्वास का संचार करना हैं। महिला सशक्तिकरण देश के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। महिलाओं का सशक्तिकरण सबसे महत्वपूर्ण चीज है क्योंकि वे रचनाकार होती हैं। अगर आप उन्हें सशक्त करें, उन्हें शक्तिशाली बनाएं, प्रोत्साहित करें, यह देश के लिए अच्छा है। ऐसा करना कोई बड़ी बात नहीं है, ऐसा सदियों से होता आया है। राष्ट्र निर्माण गतिविधियों में महिलाओं की भूमिका को ध्यान में रखते हुए सरकार ने वर्ष 2001 को महिला सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया था और महिलाओं को स्वशक्ति प्रदान करने की राष्ट्रीय नीति अपनाई थी।


महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, कानूनी और राजनीतिक रूप से मजबूत बनाने के लिए कई कानून बनाए गए हैं। ग्रामीण भारत की भूमिका को ध्यान में रखते हुए सरकार ने महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के साथ पंचायती राज प्रणाली को सशक्त बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। इससे कई महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में निर्वाचित होने का प्रोत्साहन मिला है जो उनके राजनीतिक सशक्तिकरण का संकेत है।


राष्ट्रीय नीति का लक्ष्य महिलाओं की उन्नति, विकास और सशक्तिकरण सुनिश्चित करना है। उसके उद्देश्यों में महिलाओं के विकास के लिए सकारात्मक आर्थिक एवं सामाजिक नीतियों के माध्यम से ऐसा अनुकूल माहौल तैयार करना है जिससे महिलाएं अपनी क्षमता को साकार कर सकें तथा स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार, समान पारिश्रमिक एवं सामाजिक सुरक्षा का लाभ उठा सकें। भारत में कई महिलाओं ने महिला सशक्तिकरण की राह में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।


हर क्षेत्र में महिलाओं ने वाकई अच्छे काम कर रही है चाहे वो मनोरंजन का क्षेत्र हो या शिक्षा का क्षेत्र। ग्रामीण क्षेत्र में भी महिलाओं का योगदान अलग-अलग रहता है। हस्तशिल्प से संबंधित वस्तुओं के उत्पादन एवं विक्रय में महिलाओं ने परम्परागत रूप से सक्रिय योगदान दिया। दिन ब दिन होने वाली महिलाओं के ऊपर शोषण की कहानी इस तस्वीर को बर्बाद कर देती है। आज महिलाएं न तो घर में सुरक्षित है और बाहर। अगर सशक्तिकरण की बात करें तो भारत के कई हिस्सों में महिलाओं को शिक्षा से दूर रखने पर जोर दिया जाता है। चन्द मुठ्ठी भर महिलाओं के उत्थान करने से पूरे नारी समाज का कल्याण नहीं हो सकता है। अगर महिलाओं को सशक्त करना है तो पहले समाज को जागरुक करना होगा।


महिला सशक्तिकरण की समस्या

महिला सशक्तीकरण के अंतर्गत महिलाओं से जुड़े सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और कानूनी मुद्दों पर संवेदनशीलता और सरोकार व्यक्त किया जाता है।सशक्तीकरण की प्रक्रिया में समाज को पारंपरिक पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण के प्रति जागरूक किया जाता है, जिसने महिलाओं की स्थिति को सदैव कमतर माना है।


वैश्विक स्तर पर नारीवादी आंदोलनों और यूएनडीपी आदि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने महिलाओं के सामाजिक समता, स्वतंत्रता और न्याय के राजनीतिक अधिकारों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।महिला सशक्तीकरण, भौतिक या आध्यात्मिक, शारिरिक या मानसिक, सभी स्तर पर महिलाओं में आत्मविश्वास पैदा कर उन्हें सशक्त बनाने की प्रक्रिया है।


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By Chanchal Sailani | December 20, 2022, | Editor at Gurugrah_Blogs.

 





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